§ 01

नींद की संरचना और मायोफेशियल दर्द

नींद की संरचना सुधारने वाली दवाओं का अवलोकन

नींद की संरचना सुधारने वाली दवाओं का अवलोकन

नींद और मायोफेशियल पेन सिंड्रोम का रिश्ता केवल साथ-साथ चलने वाला नहीं है — यह तंत्र के स्तर पर दोनों दिशाओं में जुड़ा हुआ है। नींद की ख़राब संरचना, ख़ासकर एनआरईएम चरण तीन और चार की गहरी स्लो-वेव नींद की कमी, सीधे ट्रिगर पॉइंट को सक्रिय बनाए रखती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि रात में होने वाली मांसपेशी की मरम्मत, वृद्धि हार्मोन का स्राव, और दर्द को दबाने वाले अवरोही दर्द-निवारक मार्ग — ये सब उसी गहरी, बहाल करने वाली नींद में सक्रिय होते हैं।

हार्वी मोल्डोफ्स्की के बुनियादी शोध ने फ़ाइब्रोमायल्जिया और मायोफेशियल मरीज़ों में अल्फ़ा-डेल्टा नींद की गड़बड़ी पहचानी: अल्फ़ा तरंगें, जो आम तौर पर जागते समय होती हैं, डेल्टा नींद में घुस आती हैं और गहरी, बहाल करने वाली अवस्थाओं को बनने नहीं देतीं। जब स्वस्थ स्वयंसेवकों में जान-बूझकर चरण चार की नींद बार-बार तोड़ी गई, तो कुछ ही दिनों में उन्हें फैला हुआ मांसपेशी का दर्द और कोमल बिंदु हो गए — यह बताता है कि अकेली नींद की गड़बड़ी ही मायोफेशियल दर्द जैसा रूप पैदा कर सकती है।

इस समझ से मायोफेशियल दर्द में नींद का इलाज सिर्फ़ लक्षण-प्रबंधन से बदलकर रोग-संशोधक थेरेपी के स्तर पर पहुँच जाता है। नींद की संरचना — ख़ासकर स्लो-वेव नींद — को लौटाना उस आत्म-पोषित चक्र को तोड़ता है, जहाँ दर्द नींद को बिगाड़ता है, और बिगड़ी नींद दर्द को और बढ़ाकर ट्रिगर पॉइंट को सक्रिय बनाए रखती है। इसीलिए दवा का चुनाव मायने रखता है: एक दवा जो केवल बेहोशी जैसी नींद ले आती है, जैसे ज़ेड-वर्ग की दवा, उससे बहुत अलग है जो उन्हीं अवस्थाओं को लौटाती है जिनकी मायोफेशियल मरीज़ों में कमी होती है, जैसे ट्रैज़ोडोन।

समय-सीमा समझना भी ज़रूरी है: नींद की संरचना तुरंत नहीं लौटती। मरीज़ को पहले ही बता दें कि नियमित दवा लेने पर भी तीन से चार हफ़्ते लग सकते हैं, उसके बाद ही नींद के सुधार से दर्द में फ़र्क महसूस होने लगता है। अगर यह उम्मीद पहले से तय न की जाए, तो लोग अक्सर बहुत जल्दी दवा छोड़ देते हैं।

§ 02

नींद की दवाओं की रूपरेखा

हर नींद-दवा का अपना अलग तंत्र, नींद की संरचना पर अपना असर, और अपनी जोखिम-रूपरेखा है। मायोफेशियल दर्द के इलाज में सबसे ज़रूरी फ़र्क यह समझना है कि दवा केवल नींद ले आती है, या वह उन गहरी स्लो-वेव अवस्थाओं को सच में लौटाती है, जिनकी कमी मायोफेशियल दर्द में ख़ास तौर पर होती है।

फार्माकोलॉजी

फार्माकोलॉजी

नींद की अवस्थाओं पर असर का चित्र

ट्रैज़ोडोन — भारत में ट्रैज़ोनिल और ट्रैज़ालॉन नाम से

सेरोटोनिन एंटागोनिस्ट और रीअपटेक इन्हिबिटर (सारी)
तंत्र: यह सेरोटोनिन-२ए रिसेप्टर एंटागोनिस्ट और सेरोटोनिन रीअपटेक इन्हिबिटर है, यानी सारी वर्ग की दवा। कम खुराक — रात को ५०–१५० मिग्रा — पर यह मुख्य रूप से नींद लाने वाली दवा की तरह काम करती है, क्योंकि यह ५-एचटी२ए और हिस्टामीन-एच१ रिसेप्टर दोनों को ब्लॉक कर देती है। इसकी सबसे ख़ास बात यह है कि यह स्लो-वेव नींद यानी एनआरईएम की गहरी अवस्थाएँ तीन और चार को बढ़ाती है, वह भी रेम नींद को दबाए बिना — और ठीक यही वह कमी है जो मायोफेशियल पेन सिंड्रोम के मरीज़ों में मोल्डोफ्स्की की अल्फ़ा-डेल्टा गड़बड़ी के रूप में दिखती है। आधा जीवन ५–९ घंटे का है। नशे की लत का जोखिम बहुत कम है और इसका कोई अलग नियंत्रित-वर्ग वर्गीकरण नहीं है, हालाँकि भारत में यह सीडीएससीओ अनुसूची एच की पर्ची-आधारित दवा है। जिन मायोफेशियल मरीज़ों में साथ-साथ अनिद्रा भी हो, उनके लिए यह आम तौर पर पहली पसंद बन जाती है। संभावित दुष्प्रभाव: खड़े होने पर रक्तचाप गिरना, पुरुषों में दुर्लभ पर गंभीर प्रायपिज़्म, और अधिक खुराक पर सुबह की सुस्ती। शुरुआत रात को सोते समय २५–५० मिग्रा से करें, फिर ज़रूरत पड़ने पर धीरे-धीरे १००–१५० मिग्रा तक बढ़ाएँ।

ज़ोल्पिडेम — भारत में ज़ोल्फ्रेश, सोव और नाइट्रेस्ट नाम से

ज़ेड-वर्ग की दवा — गाबा-ए (एक निरोधक रिसेप्टर) के अल्फ़ा-१ उप-घटक की एगोनिस्ट
तंत्र: यह बेंज़ोडायाज़ेपीन नहीं है, फिर भी नींद लाने वाली दवा है, जो गाबा-ए रिसेप्टर के अल्फ़ा-१ उप-घटक से चुनकर जुड़ती है — नींद तो जल्दी ले आती है, पर गहरी नींद की संरचना को सार्थक ढंग से नहीं सुधारती। तुरंत-रिलीज़ रूप का आधा जीवन सिर्फ़ २–३ घंटे है। मायोफेशियल दर्द में यह नींद आने में लगने वाली देरी घटाने के लिए कारगर है, पर रात भर नींद बनाए रखने के लिए नहीं। इसका उपयोग केवल अल्पकालिक रखें — लगातार दो हफ़्ते से अधिक नहीं — वरना सहनशीलता बढ़ती है और निर्भरता का जोखिम भी। एक गंभीर चेतावनी अमेरिकी एफ़डीए की ब्लैक-बॉक्स चेतावनी से जुड़ी है: कुछ मरीज़ों में नींद के दौरान जटिल व्यवहार दर्ज हुए हैं — नींद में चलना, गाड़ी चलाना, खाना खाना। खुराक महिलाओं में ५ मिग्रा और पुरुषों में ५–१० मिग्रा, सोने से ठीक पहले। क्रोनिक मायोफेशियल दर्द में नींद की जो गड़बड़ी होती है, उसका दीर्घकालिक हल यह दवा नहीं है। भारत में यह सीडीएससीओ अनुसूची एच की पर्ची-आधारित दवा है।

एस्ज़ोपिक्लोन — विदेश में लूनेस्टा; भारत में ज़ेड-पिक्लोन और एज़ेस्ट नाम से

ज़ेड-वर्ग की दवा — लंबा आधा जीवन
तंत्र: यह भी बेंज़ोडायाज़ेपीन-रहित गाबा-ए एगोनिस्ट है — दरअसल ज़ोपिक्लोन का सक्रिय एस-समावयव। आधा जीवन ६ घंटे का है, जो ज़ोल्पिडेम से लंबा होने के कारण रात भर नींद बनाए रखने में थोड़ी मदद देता है। दर्द के साथ कुछ लाभ का सीमित संकेत मिलता है: सन् २००९ की एक छोटी पायलट ट्रायल में, जिसमें ऐसे रूमेटॉइड आर्थराइटिस मरीज़ शामिल थे जिन्हें अनिद्रा भी थी, चार हफ़्ते तक रोज़ ३ मिग्रा एस्ज़ोपिक्लोन देने से नींद के पैमाने सुधरे और कोमल जोड़ों की संख्या तथा दर्द के स्कोर में थोड़ी कमी आई — यह क्रोनिक दर्द आबादी में मिलने वाला सबसे क़रीबी प्रत्यक्ष प्रमाण है, पर इसे सभी मायोफेशियल मरीज़ों पर अपने-आप लागू नहीं किया जा सकता। खुराक बुज़ुर्गों में १ मिग्रा और बाक़ी में सोते समय ३ मिग्रा तक। अक्सर बताया गया दुष्प्रभाव — मुँह में धातु जैसा स्वाद। ज़ोल्पिडेम की तुलना में यह नींद बनाए रखने में बेहतर है, पर मायोफेशियल दर्द की उस स्लो-वेव कमी को यह भी ख़ास तौर पर नहीं भरती, जो ट्रिगर पॉइंट को बनाए रखती है। भारत में यह सीडीएससीओ अनुसूची एच में आती है।

सुवोरेक्सेंट — विदेश में बेल्सोम्रा; भारत में सीमित उपलब्धता

दोहरा ओरेक्सिन (जागरूकता-नियामक न्यूरोपेप्टाइड) रिसेप्टर एंटागोनिस्ट, संक्षेप में डोरा
तंत्र: ओरेक्सिन — जिसे हाइपोक्रेटिन भी कहते हैं — के रिसेप्टर ओएक्स-१आर और ओएक्स-२आर को यह दवा ब्लॉक करती है। यानी नींद लाने के लिए निरोधक गाबा पथ बढ़ाने के बजाय, यह जागते रहने वाले ओरेक्सिन तंत्र को दबाती है। यह एक नया तंत्र है, जिसकी सुरक्षा-रूपरेखा मूल रूप से अलग है: यह श्वसन-दमन नहीं करती, इसलिए अवरोधक नींद-श्वास रोग में भी इसे सुरक्षित माना जाता है — और मायोफेशियल मरीज़ों में यह रोग अक्सर साथ देखा जाता है। आधा जीवन १२ घंटे का है। खुराक सोते समय १०–२० मिग्रा। यह उन मायोफेशियल मरीज़ों के लिए एक उभरता हुआ विकल्प है, जिन्हें पारंपरिक नींद-दवाओं से लाभ नहीं हुआ या जो उन्हें सहन नहीं कर पाए। ज़ेड-वर्ग की दवाओं की तुलना में यह नींद की स्वाभाविक संरचना को कुछ हद तक बेहतर बनाए रख सकती है। मुख्य सीमाएँ: ऊँची क़ीमत, बड़ी खुराक पर अगले दिन की सुस्ती, और मायोफेशियल-विशिष्ट प्रमाण अभी सीमित हैं। भारत में यह हर जगह आसानी से नहीं मिलती — फार्मासिस्ट से पूछें।
§ 03

तंत्र और नींद की अवस्थाओं पर असर

मायोफेशियल दर्द के लिए नींद की दवाओं में सबसे महत्वपूर्ण फार्माकोलॉजिकल फ़र्क है — कौन सी दवा स्लो-वेव नींद यानी एनआरईएम चरण तीन-चार को बढ़ाती है। ट्रैज़ोडोन अपने ५-एचटी२ए एंटागोनिज़्म के ज़रिए गहरी नींद को सक्रिय रूप से बढ़ावा देता है और स्लो-वेव अवस्था की अवधि बढ़ाता है। इसके उलट, ज़ेड-वर्ग की दवाएँ मुख्य रूप से गाबा-ए के अल्फ़ा-१ उप-घटक पर निरोधक असर बढ़ाकर नींद आने में लगने वाला समय घटाती हैं, पर गहरी नींद के अनुपात पर इनका सार्थक असर नहीं दिखता।

सुवोरेक्सेंट नींद की फार्माकोलॉजी में एक नया रास्ता खोलता है। निरोधक गाबा मार्ग बढ़ाने या जागते रखने वाले न्यूरोट्रांसमीटर — सेरोटोनिन और हिस्टामीन — को ब्लॉक करने के बजाय, यह सीधे ओरेक्सिन वाली जागृति-प्रणाली को दबाता है। इस तंत्र से नींद की संरचना अधिक स्वाभाविक बनी रहती है — और मायोफेशियल मरीज़ों के लिए ख़ास बात यह है कि यह श्वसन-दमन नहीं करता, इसलिए अवरोधक नींद-श्वास रोग में भी इसे सुरक्षित माना जाता है, जो इन मरीज़ों में अक्सर साथ देखा जाता है।

मायोफेशियल दर्द में स्लो-वेव नींद को लौटाना केवल लक्षण-प्रबंधन नहीं है — यह उस कारक पर सीधे काम करना है जो ट्रिगर पॉइंट को बनाए रखता है।

५-एचटी२ए

ट्रैज़ोडोन — सेरोटोनिन एंटागोनिज़्म से स्लो-वेव नींद बढ़ाता है

गाबा-ए

ज़ेड-वर्ग की दवाएँ — नींद ले आती हैं, पर संरचना नहीं लौटातीं

ओएक्स-१/२आर

सुवोरेक्सेंट — जागने का संकेत दबाता है, स्वाभाविक नींद बचाता है
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दवा कैसे चुनें

सही नींद-दवा चुनने के लिए चार बातें परखनी होती हैं — नींद की कौन सी विशिष्ट कमी है, साथ की कौन सी बीमारियाँ हैं, दूसरी दवाओं से क्या परस्पर प्रभाव (interaction) संभव है, और इलाज की अवधि क्या तय है। नीचे दिए चार पैमाने इसी निर्णय को व्यवस्थित करते हैं।

नींद की संरचना का मूल्यांकन

दर्द को बनाए रखने वाली नींद की विशिष्ट कमी की पहचानपहले देखें कि असली समस्या क्या है — नींद आने में देरी, बार-बार नींद टूटना, या लगातार सोने पर भी ताज़गी न मिलना। नींद आने की समस्या में ज़ोल्पिडेम या ट्रैज़ोडोन सबसे अच्छा काम करते हैं। नींद बनाए रखने की समस्या में एस्ज़ोपिक्लोन या सुवोरेक्सेंट बेहतर हैं। ताज़गी न मिलने का पैटर्न, जो मायोफेशियल दर्द में अक्सर दिखता है, उसके लिए ट्रैज़ोडोन सबसे उपयुक्त है, क्योंकि यह ख़ास तौर पर स्लो-वेव नींद को बढ़ाता है।

अन्य बीमारियों की जाँच

साथ की स्थितियों के अनुसार दवा का चुनावअवसाद या चिंता साथ हो तो ट्रैज़ोडोन को प्राथमिकता दें, क्योंकि सारी वर्ग होने से इसका दोहरा लाभ मिलता है। अवरोधक नींद-श्वास रोग में सुवोरेक्सेंट चुनें, जो श्वसन-दमन नहीं करता — ज़ेड-वर्ग की दवाओं और बेंज़ोडायाज़ेपीन से बचें। नशे की लत का इतिहास हो तो ट्रैज़ोडोन या सुवोरेक्सेंट, जिनमें नशे का जोखिम कम है — ज़ेड-वर्ग की दवाएँ टालें। बुज़ुर्ग मरीज़ों में हर दवा कम से कम खुराक से शुरू करें — एस्ज़ोपिक्लोन १ मिग्रा या ट्रैज़ोडोन २५ मिग्रा। ओपिओइड पर चल रहे क्रोनिक दर्द के मरीज़ों में सुवोरेक्सेंट सबसे सुरक्षित है, क्योंकि इसमें अतिरिक्त श्वसन-दमन का जोखिम नहीं रहता।

इलाज की अवधि की योजना

अल्पकालिक पुल बनाम दीर्घकालिक नींद-बहालीज़ेड-वर्ग की दवाएँ यानी ज़ोल्पिडेम और एस्ज़ोपिक्लोन: अधिकतम दो से चार हफ़्ते, यानी जब तक नींद का तीव्र संकट चल रहा हो और साथ में मूल कारणों पर काम जारी हो। ट्रैज़ोडोन: कम खुराक पर महीनों से वर्षों तक चल सकती है, बिना सहनशीलता या निर्भरता बने। सुवोरेक्सेंट: तीन से बारह महीने के मध्यम-अवधि उपयोग का समर्थन करने वाले प्रमाण मौजूद हैं। दवा के साथ हमेशा बेहतर नींद की आदतें और ट्रिगर पॉइंट का इलाज जोड़ें — दवा एक पुल है, मंज़िल नहीं।

दवाओं के परस्पर प्रभाव की जाँच

नींद की दवा शुरू करने से पहले ज़रूरी परस्पर-प्रभाव समीक्षाट्रैज़ोडोन के साथ एमएओआई वर्ग की दवाएँ देने पर सेरोटोनिन सिंड्रोम का जोखिम होता है — इन्हें एक साथ बिल्कुल न दें, यह पूर्ण निषेध है। ट्रैज़ोडोन के साथ सीवायपी-३ए४ अवरोधक जैसे केटोकोनाज़ोल या रिटोनाविर देने पर शरीर में ट्रैज़ोडोन का स्तर बढ़ सकता है। ज़ोल्पिडेम के साथ केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को दबाने वाली दवाएँ या शराब लेने पर सुस्ती और श्वसन-दमन दोनों बढ़ जाते हैं। सुवोरेक्सेंट के साथ तेज़ सीवायपी-३ए४ अवरोधक हों, तो सुवोरेक्सेंट की खुराक १० मिग्रा से अधिक न रखें। नींद की कोई भी दवा शराब के साथ नहीं — यह सख़्त मनाही है, और मरीज़ को पूरी तरह शराब छोड़ने की सलाह दें।
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इलाज के व्यावहारिक रास्ते

मायोफेशियल दर्द में नींद की दवा एक चरणबद्ध रास्ते पर चलती है: नींद के तीव्र संकट को संभालना, गहरी नींद की संरचना को लौटाना, और जैसे-जैसे ट्रिगर पॉइंट का इलाज दर्द-नींद के चक्र को कमज़ोर करे, धीरे-धीरे दवा छोड़कर ग़ैर-दवा वाले उपायों पर पहुँचना।

दवा चुनने का निर्णय-वृक्ष

दवा चुनने का निर्णय-वृक्ष

मायोफेशियल दर्द में नींद की दवाएँ

पहली पसंद: ट्रैज़ोडोन प्रोटोकॉल

मायोफेशियल दर्द में नींद की संरचना सुधारने के लिए ट्रैज़ोडोन सबसे उपयुक्त पहली दवा मानी जाती है — यह स्लो-वेव नींद की उस कमी को सीधे भरती है जो अल्फ़ा-डेल्टा गड़बड़ी से जुड़ी है, और इसमें निर्भरता का जोखिम लगभग नहीं के बराबर है।

  • ट्रैज़ोडोन रात को सोते समय २५–५० मिग्रा से शुरू करें; दो हफ़्तों में धीरे-धीरे १००–१५० मिग्रा तक बढ़ाएँ
  • स्लो-वेव नींद में सुधार तीन से चार हफ़्तों में आँकें — मरीज़ बताए कि उठने पर ताज़गी महसूस होती है
  • साथ में नींद की आदतें: एक ही समय पर सोना, ठंडा कमरा, सोने से एक घंटा पहले स्क्रीन बंद
  • खड़े होने पर रक्तचाप गिरने पर ध्यान दें — मरीज़ से कहें पहले बैठें फिर खड़े हों, ख़ासकर बुज़ुर्ग मरीज़
  • असर दिखे तो कम से कम तीन से छह महीने जारी रखें, साथ ही ट्रिगर पॉइंट को बनाए रखने वाले कारकों पर काम करें

अल्पकालिक संकट: ज़ेड-वर्ग की दवा का पुल

ज़ेड-वर्ग की दवाएँ मायोफेशियल दर्द में नींद के तीव्र संकट के समय एक छोटे पुल का काम करती हैं — जब अनिद्रा इतनी बढ़ जाए कि दिन में पुनर्वास करना मुश्किल हो जाए। ये दीर्घकालिक हल नहीं हैं।

  • ज़ोल्पिडेम महिलाओं में ५ मिग्रा, पुरुषों में ५–१० मिग्रा — नींद आने की तीव्र समस्या के लिए, अधिकतम दो हफ़्ते
  • अगर मुख्य समस्या रात भर नींद बनाए रखने की है तो एस्ज़ोपिक्लोन १–३ मिग्रा, जिसका आधा जीवन लंबा होता है
  • ज़ेड-वर्ग की दवा के साथ-साथ ही दीर्घकालिक दवा के रूप में ट्रैज़ोडोन शुरू करें
  • नींद के दौरान जटिल व्यवहार के बारे में मरीज़ को आगाह करें: नींद में चलना, गाड़ी चलाना, खाना खाना — दिखें तो दवा तुरंत बंद करें
  • पर्ची लिखते समय ही दवा बंद करने की तारीख़ तय कर दें — खुली अवधि के लिए न छोड़ें

साथ में नींद-श्वास रोग होने पर प्रोटोकॉल

कई मायोफेशियल मरीज़ों में अवरोधक नींद-श्वास रोग भी होता है, जिसमें अधिकांश पारंपरिक नींद-दवाएँ नहीं दी जातीं। सुवोरेक्सेंट यहाँ एक श्वसन-सुरक्षित विकल्प है।

  • सुवोरेक्सेंट सोते समय १० मिग्रा; एक हफ़्ते बाद ज़रूरत हो तो २० मिग्रा तक बढ़ाएँ
  • यह श्वसन-दमन नहीं करता — सीपीएपी मशीन के साथ या उसके बिना भी सुरक्षित माना जाता है
  • अगर गहरी स्लो-वेव नींद को और बढ़ाने की ज़रूरत हो, तो इसे कम खुराक के ट्रैज़ोडोन के साथ जोड़ा जा सकता है
  • अगले दिन की सुस्ती पर ध्यान दें — दिन की दिनचर्या प्रभावित हो रही हो तो खुराक कम करें
  • अगर नींद-श्वास रोग का संदेह है पर निदान नहीं हुआ, तो नींद-अध्ययन यानी पॉलीसोम्नोग्राफ़ी के लिए रेफ़र करें

दवा धीरे-धीरे कम करना और लंबी रणनीति

नींद की दवा का इलाज एक तय रास्ते पर चलना चाहिए: तीव्र संकट को संभालना, नींद की संरचना लौटाना, और जैसे-जैसे ट्रिगर पॉइंट का इलाज दर्द-नींद के चक्र को कम करे, दवा को धीरे-धीरे छोड़ना।

  • ज़ेड-वर्ग की दवाएँ: दो हफ़्ते के बाद कम करें — तीन रातों के लिए खुराक आधी करें, फिर बंद
  • ट्रैज़ोडोन: लंबे समय तक चल सकती है, पर हर तीन महीने में मायोफेशियल सुधार के साथ खुराक घटाने की कोशिश करें
  • सुवोरेक्सेंट: एक से दो हफ़्तों में धीरे-धीरे कम करें; बंद करने पर लौटने वाली अनिद्रा ज़ेड-वर्ग की दवाओं जितनी तीव्र नहीं होती
  • दवा कम करते समय लौटने वाली अनिद्रा पर निगरानी रखें — एक रात की राहत-योजना तैयार रखें, यानी ज़ोल्पिडेम की एक खुराक
  • लंबे समय में दवा की जगह नींद की आदतें और अनिद्रा के लिए संज्ञानात्मक-व्यवहार थेरेपी को मुख्य रणनीति बनाना चाहिए
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चेतावनी के संकेत — दुरुपयोग और ख़तरनाक संयोजन

नींद की दवाओं से होने वाले अधिकांश गंभीर परिणाम पहले से रोके जा सकते हैं — सही दवा का चुनाव, तय अवधि, और सतर्क निगरानी से। नीचे दी स्थितियों में तुरंत हस्तक्षेप ज़रूरी है।

मुख्य बातें

  • क्रोनिक मायोफेशियल दर्द में ख़राब नींद कारण भी है और परिणाम भी — मोल्डोफ्स्की की अल्फ़ा-डेल्टा गड़बड़ी बताती है कि एनआरईएम चरण तीन और चार की कमी सीधे ट्रिगर पॉइंट को बनाए रखती है। नींद की संरचना लौटाना सिर्फ़ लक्षण-प्रबंधन नहीं, असली इलाज है।
  • इस स्थिति में पहली पसंद की नींद-दवा ट्रैज़ोडोन है, रात को ५०–१५० मिग्रा — यह स्लो-वेव नींद को ख़ास तौर पर बढ़ाती है, रेम को नहीं दबाती, इसमें निर्भरता का जोखिम नहीं है, और लंबे समय तक चलाई जा सकती है।
  • ज़ेड-वर्ग की दवाएँ यानी ज़ोल्पिडेम और एस्ज़ोपिक्लोन नींद तो ले आती हैं, पर वह गहरी संरचना नहीं लौटातीं जो मायोफेशियल मरीज़ों को चाहिए — इन्हें केवल अल्पकालिक संकट के लिए, अधिकतम दो से चार हफ़्ते रखें, और साथ ही ट्रैज़ोडोन भी शुरू करें।
  • जिन मरीज़ों में नींद-श्वास रोग साथ है, उनके लिए सुवोरेक्सेंट एक उभरता हुआ विकल्प है — यह श्वसन-दमन नहीं करता, और ज़ेड-वर्ग की दवाओं तथा बेंज़ोडायाज़ेपीन पर यही इसका बड़ा फ़ायदा है।
  • नींद की संरचना सुधरने से दर्द पर मापने योग्य फ़र्क आने में आम तौर पर तीन से चार हफ़्ते लगते हैं — इसलिए मरीज़ की उम्मीदें पहले से तय करें, और दवा के साथ नींद की आदतें तथा ट्रिगर पॉइंट का इलाज ज़रूर जोड़ें।